पाकिस्तान ने जिनेवा कन्वेंशन का पालन नहीं किया ? |जिनेवा कन्वेंशन 1949 | Geneva Convention | Third Geneva Convention | हिंदी

 जिनेवा कन्वेंशन 1949 | Geneva Convention | Third Geneva Convention | हिंदी

 

हेनरी डोरेंट जो कि रेडक्रास नाम के एक संगठन के संस्थापक थे,ने सोलफेरिनो युद्ध में जो की फ्रांस और ऑस्ट्रिया के बीच सन् 1859 मैं लड़ा गया, के दौरान एक भयानक नरसंहार देखा जहां हर तरफ रक्त ही रक्त पाया जिससे उनका हृदय द्रवित हो गया।जिसके बाद ही उन्होंने रेड क्रॉस की स्थापना की। इन्होनें एक पुस्तक भी लिखी जिसका नाम “ए मैमोरी ऑफ़ सेलफेरिनो” रखा। 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्विट्जरलैंड के जिनेवा में देशों की बैठकें बुलाई  गईं,जिसमें विभिन्न देशों ने भाग लिया, ये बैठकें विभिन्न मौकों पर बुलाई गईं, जिन्हें जिनेवा सम्मेलन कहा गया। आज विश्व के 194 इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।

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                           (1). पहला जिनेवा सम्मेलन (1864)

 

 

(A). घायल एवं बीमार सैनिकों के लिए प्रावधान

सभी सैनिकों के लिए तथा लड़ाकों के लिए बिना किसी भेदभाव के इलाज की व्यवस्था की जाएगी तथा उन्हें समय पर इलाज मुहैया कराया जाएगा। घायलों की इलाज में संलग्न प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा का जिम्मा उस देश की सरकार उठाएगी।

(B). चिकित्सा संस्थाओं के लिए प्रावधान

युद्ध में घायल या बीमार सैनिकों के लिए कार्य करने वाली चिकित्सा संस्थाओं को किसी भी सूरत में ध्वस्त नहीं किया जाएगा या उन पर किसी भी प्रकार की बमबारी नहीं की जाएगी। जिससे कि उन्हें कोई नुकसान पहुंचाया जा सके। ऐसी कोई भी कार्यवाही ऐसी चिकित्सा संस्थान पर नहीं की जाएगी। जिससे कि वहां पर इलाज के लिए मौजूद सैनिकों के इलाज में देरी हो।

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                          (2).दूसरा जिनेवा सम्मेलन (1906)

यह सम्मेलन 1964 में हुआ। इसमें मुख्यत: जलमार्ग से होने वाले युद्धों में घायल होने वाले सैनिको, लड़ाकों की रक्षा हेतु उपवन्ध बनाये गए। 

(A) समुद्री मार्गों से होने वाले हमलों में घायलों के लिए व्यवस्था 

जिनेवा के दूसरे सम्मलेन 1964 में यह बताया गया कि यदि किसी जहाज जो की टूट गया है या किसी प्रकार से छतिग्रस्त हो गया है, उसमे लड़ने वाले सैनिकों को पूर्ण रूप से इलाज मिलना चाहिए। यदि बीमार लोग हैं तो उन्हें से इलाज मिलना चाहिए। यदि कोई जहाज घायल, बीमारों को लेकर जा रहा है, तो उस पर आक्रमण नहीं किया जायेगा।   

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                         (3). तीसरा जिनेवा सम्मलेन (1929)


1929 में जिनेवा में राष्ट्रों का तीसरा सम्मलेन हुआ जिसमें युद्ध बन्दियों से सम्बंधित प्रावधानों पर चर्चा हुई तथा उनपर हस्ताक्षर हुए। 

(A). सूचना  

युद्धबंदियों पर न्यूनतम सूचना देने से अधिक सूचना देने का कोई भी दवाब नहीं डाला जायेगा। जाति,धर्म  या राष्ट्रीयता के आधार पर युद्धबंदी के साथ कोई भी विभेद नहीं किया जायेगा। 

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(B).प्रिजनर ऑफ़ वॉर (P.O.W.)

  (1).  उपचार 

           युद्ध बंदी अगर घायल है या बीमार है तो उसे जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार उपचार पाने का पूर्ण अधिकार है। 

   (2). सम्मान    

          युद्ध बंदी को किसी प्रकार से अपमानित नहीं किया जा सकता इस संधि के मुताबिक युद्धबंदी पर मुकदमा चलाया जा सकता है किन्तु युद्ध सम्पति के साथ ही उसे वापस लौटाना होगा। 

   (3). पूछ-तांछ   

          युद्ध बंदियों से मात्र उनके नाम,सैन्य पद,नंबर और यूनिट के विषय में ही जानकारी हासिल करने की अनुमति है। वे किस जाति के हैं या किस धर्म के अनुयायी है,यह पूछने की सख्त मनाही है।  इसके आलावा युद्धबंदी की डराया धमकाया नहीं जा सकता। 

किसी भी सूरत में यदि कोई युद्धबंदी पकड़ा जाता है तो उस पर यह संधि आवश्यक रूप से लागू होगी फिर चाहे वह स्त्री या पुरुष कोई भी रहा हो। 

                     (4). चौथा जिनेवा सम्मलेन(1949) 

 

 

 

(A). युद्ध प्रवर्तन में होने पर नागरिकों की सुरक्षा   

इस सम्मेलन में युद्ध के पास के क्षेत्र में भी नागरिकों को के हकों को सुरक्षित रखनें संबंधी बातें हुईं। ताकि उनके साथ ज्यादती ना हो सके। उन्हें इन्हें 21 अक्टूबर 1950 से लागू कर दिया गया ।

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