क्या एक लड़की का लड़की के साथ सेक्स करना गैरकानूनी है ? |धारा 377 क्या है ?|Dhara 377 kya Hai In Hindi | Homosexuality Legal | Dhara 377 | 377 | Homosexuality History | Homosexuality Legalised [हिंदी]

धारा 377  क्या है ?|Homosexuality Legal | Dhara 377 | 377 | Homosexuality History | Homosexuality Legalised [हिंदी]

धारा  377 मुख्यता प्रकृति के विरुद्धः किये गए सेक्स ( इन्द्रिय भोग ) पर लगाम लगाने वाली,भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की एक धारा है। ब्रिटिश काल में 1860 में यह थॉमस  बैबिंगटन मैकॉले के दिमाग की उपज थी। प्रारम्भ में यह समलैंगिकों के खिलाफ नहीं था लेकिन महारानी विक्टोरिया के पास सत्ता के हस्तांतरित होने के बाद से लगातार इस कानून को समलैंगिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और फिर अंग्रेजो के जाने के बाद हम भारतीयों ने भी उनकी इस परंपरा को बखूबी निभाया है।

1884 में पहली बार बैबिंगटन महोदय की इस उपज का गलत इस्तेमाल किया गया। एक किन्नर जिसका नाम खैराती रहा होगा उसे मात्र इस लिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योकि वह सार्वजानिक स्थान पर महिलाओ की वेशभूषा धारण किये हुए था।

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चलिए जान लेते हैं। कि भारतीय दंड संहिता की मूल धारा क्या कहती है।

   
प्रकृति विरुद्ध अपराधों के विषय में                                

 धारा 377 –  प्रकृति विरुद्ध अपराध – जो कोई, किसी पुरुष,स्त्री या जीव जन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय -भोग करेगा,वह आजीवन कारावास से या,या दोनों में  से किसी भांति के कारावास से,जिसकी अवधि 5 वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

सज़ा –  आजीवन कारावास या 5 वर्ष की जेल और जुर्माना 

आसान भाषा में जो कोई भी किसी किसी महिला,पुरुष जीव-जंतु के साथ प्रकृति के नियमो के विरुद्ध इन्द्रिय भोग करेगा यानि सेक्स करेगा वह आजीवन कारावास या 5 वर्ष तक की कैद से तथा जुर्माने से भी दण्डित किया जायेगा।

संसार के 125 देशों में समलैंगिकों को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार है। जबकि अभी भी 72 देशो में समलैंगिकता को गैर कानूनी अपराध माना गया है। जिसमे पाकिस्तान और कुछ अरब देश शामिल हैं। कुछ  देशो में तो समलैंगिकता पर मौत की सजा का प्रावधान है। गौरतलब है कि भारत में इस कानून को लाने वाला इंग्लैंड भी अब इस कानून से सम्बन्ध  नहीं रखता।

 कई अदालतों ने समलैंगिकों को ‘विकृत मानसिकता’ का बता कर सुधार गृह भेज दिया जाता था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में  कहा प्राइवेट में किसी भी चारदीवारी के अंदर रजामंदी से यह अपराध नहीं है। इस पर अपील की गयी और 2013 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पंहुचा। और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायपालिका कानून को लगा सकती है।  कानून बनाना उसका कार्य है। फिर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को भी पाना लिंग चुनने की पूरी स्वतंत्रता है। कोई पुरुष है या स्त्री वह वो खुद निर्धारित कर सकता है। और  8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा की वह धारा 377 पर पुनर्विचार करेगा।

और2018 में ‘ नवतेज सिंह जौहर बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया‘ में समलैंगिकता आपराधिक श्रेणी से हटा दिया गया। सप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 377 समलैंगिकों के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14,15,21  का भी हनन करता है।

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