प्रेम संबंधों में अपने प्रतिस्पर्धी से कैसे निपटें? | How To Deal With Your Competitor In Love | Competitor Analysis | Types Of Competitors | हिंदी

प्रेम संबंधों में अपने प्रतिस्पर्धी से कैसे निपटें? | How To Deal With Your Compititor In Love | Competitor Analysis | Types Of Competitors |हिंदी 

 

प्रतिस्पर्धी हर जगह ही हैं। अच्छी चीज़ें सबको पसंद आती है, हर कोई उन्हें पाने को लालायित रहता है। हर क्षेत्र में में आपको इनका वजूद देखने को मिल जायेगा। और कभी कभी ये आपके लिए चिंता का सबब भी बन जाते हैं। वो महोदय भी उसे छोड़ना नहीं चाहते और आप उनसे पहले ही इतने जुड़ चुके होते हैं कि अलग होना नहीं चाहते। स्थिति यह होती है की आप दोनों में परमाणु हमले की नौबत तक आ जाती है।  लेकिन समस्या यह है कि इस हमले का दंश आपके माता-पिता को झेलना पड़ता है।

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                                                                                      कभी कभी आपका प्रतिद्वंदी आपसे अधिक सामर्थ्य और राजनीतिक पहुँच वाला होता है। और किसी भी समय वह आपके किले ध्वस्त कर सकता है। लेकिन आप फिर भी उससे भिड़ जाते हैं। और आप  करा बैठते हैं। चलिए सबसे पहले जानते है कि प्रतिस्पर्धी है क्या ?  

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                                             क्या है ? प्रतिस्पर्धी।    

प्रतिस्पर्धी से अर्थ ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों से है जो एक ही कार्य करने के लिए होड़ लगाते हैं। और अपने साथी को कमज़ोर दिखने के लिए भरसक प्रयास करते हैं।

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आधुनिक प्रतिस्पर्धी वह है, जो आपको सीधे तौर पर ये भी न लगने दे कि वह आपके साथ प्रतिस्पर्धा में है।  और और अपनी कूटनीतिक चालों से आपको आपके लक्ष्य की प्राप्ति में बाधाएं उत्पन्न करता रहे। 

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                                 कैसे-कैसे होते हैं ? प्रतिस्पर्धी  (Types Of Competitors)

 

 आज आपके कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने और अपने कार्यों को सिद्ध करने में निपुण तरह तरह के प्रतिद्वंदी देखने को मिलेंगे जिनमें मुख्या तीन प्रकार के मैं यहाँ बता रहा हूँ।  

(A). अल्प अवधि प्रतिद्वंदी। 

इस प्रकार के प्रतिद्वंदी बिना बहुत अधिक अध्ययन किये बिना आपके क्षेत्र में उतर आते हैं।  कुछ समय तक ये बहुत शक्ति के साथ कार्य करते हैं। लेकिन बहुत जल्दी ही ये हतोत्साहित होकर अपने पथ पर वापस चले जाते हैं। 

(B).दीर्घावधि प्रतिद्वंदी।   

 इस प्रकार के प्रतिद्वंदी गहराई से अध्ययन करके आपके क्षेत्र में आते है। मुख्यता वे आपसे मित्रवत रहते हैं।  और आपको पता नहीं लगने देते कि वह भी प्रतिस्पर्धा में है। इस प्रकार के प्रतिद्वंदी बहुत  समय तक रहते हैं और आपके लिए परेशानी का सबब बनते हैं।   

(C). रजोगुणी प्रतिद्वंदी।  

इस प्रकार के प्रतिद्वंदी अपने फायदे पर उतने आसक्त नहीं होते, जितना वे आपके नुकसान पर।  वे मात्र इस लिए उस क्षेत्र में आते हैं ताकि वे आपका नुकसान कर सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत है –

“बिल्ली खायेगी नहीं , लेकिन फैलाएगी ज़रूर।”

 ऐसे प्रतिद्वंदी इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं। इन्हे अपने फायदे से उतना सरोकार नहीं होता।

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                            प्रेम संबंधों में अपने प्रतिस्पर्धी से कैसे निपटें?

 

प्रेम संबधों में जब बात प्रतिस्पर्धा करना वैसे तो अच्छा नहीं है। लेकिन कुछ लोगो ने आज इस एक मुकाबले की तरह बना दिया है। कभी कभी जब दो पुरुष एक ही महिला को चाहते हैं। तो उनके बीच एक होड़ लग जाती है, और कई बार इसका फायदा उस महिला को मिलता है। तो चलिए जानें अपनें प्रतिस्पर्धी  से कैसे निपटें?

(1). शत्रु न बनाएं। 

 आपने यह पहले भी सुना होगा कि मित्र से बड़ा शत्रु और कोई नहीं ! क्योंकि जितना नुकसान आप मित्र रहते कर लेंगे उतना शायद आप शत्रु रहकर नहीं कर सकेंगे। इसलिए आप उसके मित्र बने और उसके मन की थाह लेते रहे यदि आप मित्र बने रहेंगे तो आपको उसकी हर अगली गतिवधि के बारे में पता होगा, जिससे आप उसे आसानी से निष्क्रिय कर सकेंगे।

(2).विवादों से दूर। 

प्रतिस्पर्धी से किसी भी प्रकार के विवाद  क्योंकि भी महिला नहीं चाहेगी कि जिसके साथ भी वह प्रेम संबधों में है। 

 वह किसी लड़ाई झगडे या वाद विवाद में फंसा हो।  और आये दिन यदि वह उसके साथ किसी सार्वजानिक स्थान पर जाना भी चाहे तो उसे इस प्रकार की घटनाओं का सामना न करना पड़े। 

(3). राजनीति सीखें।   

जहाँ आपके पास संसाधन कम हैं , वह आपको सफलता एक मात्र राजनीती ही दिला सकती हैं। और यदि आप अपने प्रतिस्पर्धी के साथ भी मधुर सम्बन्ध रखना चाहते हैं। तो उसमें राजनीति बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं। खैर यदि आप टीनएजर  हैं, तो आपको ये बेफिजूल की बाते लगेंगी, मन करेगा कि लेखक का गाला घोंट दूँ। 

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(4). प्रयास करना न छोड़ें। 

 प्रयास करना न छोड़ें। मैं कह सकता हूँ की यदि आप प्रयास करते रहेंगे तो कहीं तक तो पहुंचेंगे,इसके उलट यदि आप  प्रयास रोक देते हैं तो वहीं रह जायेंगे जहां आप रुक गए थे। 

(5). विपदाओं से न घबरायें। 

आप कोई भी नया कार्य शुरू करेंगे तो समस्याएं आएंगी ,मुसीबतें आएंगी।  इस सम्बन्ध में ग्रन्थ कहता है –

                                    पदम् पदम् यद् विपदम न तेषां।  

यह संसार ही विपदाओं से भरा है।कदम कदम पर मुश्किलें आएँगी, और आपको उनके लिए पहले से तैयार रहना पड़ेगा।  

 

(6). बाह्य आडम्बर।

बाह्य आडम्बर सीखें।  यदि आप कमज़ोर हैं, तो अपने आपको सशक्त दिखायें। विष्णुगुप्त ने भी इस पर गहराई से बात की है आप चाहें तो उनके ग्रन्थ को देख सकते हैं। 

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